मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं


मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं,
काटने से पहले चुम लेते हैं.
देखने में बड़े मासूम हैं,
और आँखों से मजबूर लगते हैं.
मगर गोद में आते ही सीधा,
वक्षों पे निशाना साध देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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उस लड़की के वक्षों पे


यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन क्या है?


जीवन क्या है?
नदी है, तालाब है,
धारा है, किनारा है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर बहते रहना,
चाहे अपने किनारे ही डूब जाएं,
सागर से मिलने से पहले,
अपनी सारी लहरे सुख जाएँ।

जीवन क्या है?
सत्ता है, समाज है,
सुख है, विलास है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरन्तर त्याग करते रहना,
हर दुःख के बावजूद, दूसरों के दुःख,
को मिटाने का प्रयास करते रहना।

जीवन क्या है?
सूरज है, चाँद है,
आसमान है, या तारे हैं.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर अन्धकार को मिटाने का,
और प्रकाश को फैलाने का प्रयास करना।
जब तक सबके आँगन में रौशनी न पड़े,
जलते रहना, जल कर दूसरों का अन्धकार हरना।

जीवन क्या है?
ज्ञान है, विज्ञान है,
संम्मान है, संस्कार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर सहयोग करना,
पशु बन कर, गुरु बनकर,
सहयोगी बनकर।

जीवन क्या है?
उल्लास है, उत्साह है,
उत्तजेना है, उपकार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर प्रयास करना,
खोज करना की हम किसी के काम आ सके.

जीवन क्या है?
वेद है, उपनिषद है,
गीता है, धर्म है.
कुछ नहीं।
जीवन हैं निरंतर प्रेम करना,
पशुओं के जीवन को भी जीवन समझना।
उनके आँसुंओं के पीछे के दर्द को समझना।

जीवन क्या है?
उत्थान है, उद्भव है,
उन्नति है, उद्देश्य है.
कुछ नहीं।
जीवन है सिर्फ नारी ही नहीं,
हर मादा का संम्मान करना।
उनके परिवार, उनके मातृत्व को समझाना।

जीवन क्या है?
होली है, दीवाली है,
ईद है, लोहरी है.
कुछ नहीं।
जीवन है हर बुराई को मिटाना,
सभयता के नाम पे, धर्म के नाम पे,
ना सताना, ना बांधना और ना रुलाना।
सती-प्रथा, बाल-विवाह की तरह,
जालिकुट्टी और आमानवीय सभ्यताओं का विरोध करना,
त्याग करना, प्रतिकार करना, बहिष्कार करना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोयल से बोला काग रे


मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
कभी तो आके बैठ ज़रा,
मेरी इस डाल पे.
तू भी तो देख जरा आके,
कितना यहाँ सूनापन,
और कितनी मुझमे तेरी प्यास रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
तू भी काली, मैं भी काला,
फिर भी दुनिया तुझको पूजती।
छल लेती है हर बार तू मुझे,
फिर भी जग को सच्ची तू ही दिखती।
कभी तो समझ इस दिल को तू,
ये कितना अकेला और बेताब रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक दिन ऐसा कलजुग आएगा


रामचन्द्र जी कह गए सिया से, एक दिन ऐसा कलजुग आएगा।
वक्षों पे खेलेंगे कुत्ते,और कुत्तों पे वक्ष होगा।
नारी-हितेषी भटकेगा गलियों में ठोकर खाते,
और जो दलेगा नारी को, वो उसकी बाहों में होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्ते और वक्ष


कुत्ते भी क्या – क्या चमत्कार करते हैं!
कोई चुम रहा है उनकी पाँवों को,
तो कोई वक्षों से लगा बैठा है.
अब किस्मत और मौसम,
दोनों कुत्तों के साथ है शहर में.
ठण्ड भरे इस मौसम में,
मैं शायर बनके रोता हूँ,
और कोई उन्हें अपनी बाहों,
तो कोई वक्षों पे सुलाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्तों की एक भीड़ लग गयी शहर में


कुत्ते कुछ इस कदर भोकें,
बिल्लियाँ सहम गयी सारे सहर में.
और खेल भी देखो जनाब हड्डियों का,
उसने इस कदर फेंकी हड्डियां,
की कुत्तों की एक भीड़ लग गयी शहर में.

 

परमीत सिंह धुरंधर