सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ादी


दिल में एक जोश हैं,
और धड़कनो में एक उमंग।
आजा, तुझे दे दूँ,
ए आसमां, एक नया रंग।
तोड़ दूँ तेरी बेड़ियां,
या फिर तोड़ दूँ ये सारे बंधन।
परतंत्र इस धरती पे अब कोई,
अगर फूल खिले,
तो हो उसका स्वतंत्र जीवन।

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ाद


अपनी माँ की दुवाओं का, मैं एक हिसाब हूँ,
तेरी गुलशन में मालिक, मैं आज भी आज़ाद हूँ.
सितमगर ने तो ढाए वैसे कई सितम हम पर,
पर हौसले से सीने में, मैं आज भी बुलंद हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

सोलह साल


१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.

परमीत सिंह धुरंधर 

धरती भारत की


जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर