पर आज भी हम भिखारी हैं


उनकी कलम क्या लिखेगी, जो महलों के पुजारी हैं,
हमने तो बाँधा है लहरो को, पर आज भी हम भिखारी हैं.
उनकी नजरें क्या चाहेंगी, जो बस सत्ता से चिपकती हैं,
चाहत तो की बस हमने, की आज तक तन्हाई है.
क्या कहे उनपे जिनकी हर बात पे शर्म ही दुहाई है,
अजी, देखा है हमने, हर रात उनकी बजती नयी शहनाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

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