मौका अपना


दिल्ली संभल गयी, मुंबई संभल गयी,
आवो संभालें अब घर अपना।
भूल न जाना ए दोस्तों,
सुख – दुःख का साथी हैं कौन अपना।
कभी दारु पे बिक गयी,
कभी जात पे चढ़ गयी,
कभी धर्म के नाम मिट गयी,
खुशियाँ सारी अपनी।
अब तो संभल जावों ए दोस्तों,
कहीं हाथों से न निकल जाए,
दुबारा ये सुनहरा मौका अपना।

परमीत सिंह धुरंधर

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