मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


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मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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माँ तुम देवों की देव हो


माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.
जब तुम ही हो मेरे साथ, किसको पूजूँ, किसको धयाऊं?
पुत्र ही जब तुम्हारा हूँ, फिर और क्या पुण्य कमाऊं?
बस तुम्हारा आशीष ही माँ, मेरा ब्रह्मास्त्र, मेरा कवच – कुंडल है.
माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

माँ


शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।
पुत्र अगर समीप हो तो,
घर का चूल्हा कभी नहीं बुझता।
जो भी चाहो, जब भी चाहो,
पक कर गर्म थाली में मिलता।
शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

ना चरण – स्पर्श करों


ना प्रेम करों,
ना उपहास करों।
नारी तो देवी है,
पर,
ना चरण – स्पर्श करों।
ये तो माँ का सम्मान है,
ना माँ का नारी से तुलना करों।
माँ तो शक्ति हैं, माँ तो सत्य हैं,
माँ साक्षात् ब्रह्म है,
बस माँ का ही बंदन करों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ और मास्टर जी


माँ तो दबंग है,
माँ तो दबंग है,
मास्टर जी.
कहती है, खा लो,
थोड़ा तो खा लो.
छोड़ो पढाई,
मास्टर जी.
चाहे आँगन में,
या रहूँ बथान में.
आ जाती है,
लेके पकवान हाथ में.
फिर कैसे मैं पढूं?
क्या करूँ पढाई?
मास्टर जी.
मास्टर जी भी कांप गए,
लेके छड़ी हाथ में.
बोले, कोई बात नहीं बेटा,
माँ तो सर्वोपरि है.
खा – खा के करो पढाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर