मैं भगीरथ सा अडिग हूँ


मैं धीमा – धीमा,
पर प्रबल हूँ.
तुम त्वरित-त्वरित,
पर क्षणिक हो.
मैं दीप, दीपक सा,
प्रज्जवलित हूँ.
तुम अग्नि सा,
प्रचंड हो.
यह जंग हैं,
अपने इरादो की.
मेरे प्रयासों की,
तुम्हारे लालसाओं की.
तुम सुरसा सा,
विकृत हो.
मैं भगीरथ सा,
अडिग हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

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