हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ


डूबता हैं किनारें वही,
जो नदियों के सहारे हैं.
है समुन्दर यहाँ अपना,
और हम समुन्दर के किनारें हैं.

चुभते हैं काँटे उनको,
जिन्हे फूलों की तमन्ना।
है शीशम यहाँ अपना,
और हम उसकी शाखाएँ हैं.

गर्व किसी का भी हो टूटता है,
खुदा से कितना भी दुआ कर लो.
हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ,
और हम उनके तराने हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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पुत्र


पुत्र वही जो पिता के अपने चरणों में अभिमान करे,
चाहे शिव ही साक्षात् समक्ष हो,
वो पिता का ही गुणगान करे.

कुछ मोल नहीं इस जग में,
चाहे अमृतवा का ही पान हो,
वीर वही जो पिता के पाने शत्रुओं का संहार करे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे पिता हैं शालिग्राम


अगर जीवन है एक संग्राम,
तो मेरे पिता हैं शालिग्राम।
जाने वो कौन सा एक पुण्य था,
जो मुझको मिला ये धाम.
कोई त्रिस्कार, कोई पुरस्कार,
अब मायने नहीं रखता।
इस रक्त से प्रवाहित मस्तक पे,
अब कोई और ताज नहीं शोभता।
अगर साँसों का होना है,
ब्रह्म के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण,
तो मेरे पिता हैं उन वेदों का समस्त ज्ञान।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भी महाकाल से टकराता


मेरे पिता,
प्रेम था आपसे इतना,
की मैं विषपान कर लेता।
कलयुग है ये, वरना मैं भी,
महाकाल से टकराता।
मेरे दुखों को मिटाने को,
पिता ने जीवन बिता दिया।
मेरे मुस्कराहट को प्रज्जवलित रखने को,
जिसने जग से ठान लिया।
मेरे पिता,
मैं कमजोर निकला,
कुछ कर ना सका.
कलयुग है, वरना मैं भी,
कुरुक्षेत्र सजा देता।
महाकाल से, अपनी साँसों से,
आपका जीवन बदल लेता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पिता का तिलिश्म


पिता की मौत के बाद,
मैंने घर को तितर -बितर कर दिया।
जाने क्या ढूंढ रहा था?
घर वाले परेशान,
बड़ा भाई पागल हो गया है क्या?
सबके आँखों में सवाल,
लेकिन सब खामोश।
लेकिन मेरा अंतर्मन, जानता था मेरी लालच को,
वो पहचानता था मेरे अंदर के बईमान इंसान को.
मैं वो खजाना जल्द -से -जल्द,
प्राप्त करना चाहता था.
जिसके बल में मेरे पिता ने,
शान-ओ-सौकत की जिंदगी मुझे दी थी.
जिसके बल पे मैंने पुणे विद्यापीठ और,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में,
अमीरी के अहंकार को जिया था.
जिस पिता के खजाने को मैंने,
लड़कियों के आगे -पीछे,
उनके हुस्न पे लुटाया था.
जिद, अहंकार या राजपूती शान के सारे,
मेरे अपने गढ़े तमगे,
जो मैं शान से ढोता था.
सच्चाई है की वो मेरे ना परिश्रम का फल था,
ना मेरे पौरुष की कहानी।
मैंने सिर्फ और सिर्फ अपने पिता के मेहनत और संचय,
को अपने अहम् का ढाल बनाया था.

पसीने से लथ-पथ जब मैंने एक कोने में सर पकड़ लिया,
माँ ने आँचल से पोंछते हुए पूछा, “क्या ढूंढ रहे हो बेटा?”
मेरे कहने पे की पैसे या कोई कागज बैंक का,
माँ उठी, और एक पोटली उसकी साड़ी की बनी,
लाकर मेरे आगे रख दिया, “बस यही है बेटा।”
एक भूखे भेड़िये सा मैं उस पोटली पे टूट पड़ा,
लेकिन उसके खुलते ही मेरे अंदर तक अँधेरा छा गया.
सेवा-निविर्ती का पत्र और उनकी आखिरी तनखाह,
और इसी पे उन्होंने आठ लोगो को ऐसे पोसा,
जैसे कोहिनूर हो संदूक में.
उस दिन मैं गरीब हो गया,
उस दिन मेरा अहंकार मुझपे हंस रहा था.
एक पिता ने एक तिलिश्म बना के रखा था,
जो उस दिन ढह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में


अपने पिता के प्रेम में पुकारता हूँ प्रभु शिव तुम्हे,
मेरे पिता को लौटा दो,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
मुझे भय नहीं मौत का, ताप का,
बस मुझे गोद दिला दो फिर वही,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर