पापा


प्रखर था,
प्रबल था,
प्रमुख था,
प्रधान था,
प्रवाहित था,
प्रज्जवल्लित था,
दीप सा.

निडर था,
निर्भय था,
मुखर था,
निश्छल था,
निस्चल था,
अटल था,
अचल था,
पर्वत सा.

प्रतिभावान था,
प्रकाशवान था,
उदयमान था,
गतिमान था,
विराजमान था,
उर्जावान था,
सूर्य सा.

तेज था,
ताप था,
वेग था,
बहाव था,
प्रहाव था,
कटाव था,
मुझमे दरिया सा.

कटाक्ष था,
खवाब था,
लगाव था,
जुड़ाव था,
आत्मविश्वास था,
सम्मोहन था,
मुझमे चाँद सा.

कुटिल था,
जटिल था,
विकट था,
विरल था,
विराट था,
अकंटक था,
असाध्य था,
समुन्द्र सा.

अब,
मंद हूँ,
मूक हूँ
मजबूर हूँ,
सरल हूँ,
साध्य हूँ,
स्थिर हूँ,
वृक्ष सा.

अब,
जड़ित हूँ,
पीड़ित हूँ,
प्रताड़ित हूँ,
शोषित हूँ,
शासित हूँ,
कुपोषित हूँ,
धूसरित हूँ,
पशु सा.

दीन हूँ,
दुखी हूँ,
विस्मित हूँ,
पराजित हूँ,
विभाजित हूँ,
विस्थापित हूँ,
निर्बल हूँ,
निर्धन – निस्सहाय सा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Advertisements

पापा और परमीत


जब तक थे पापा,
परमीत था निराला।
जब से गए पापा,
परमीत हैं अकेला।
तरकश में मेरे तब,
तीरों की कमी थी.
फिर भीं मेरे तीरों ने,
परचम था लहराया।
तरकश में मेरे अब तीर -ही तीर हैं,
मगर अभी तक मैंने,
एक भी दुर्ग नहीं ढाया।
जब तक थे पापा,
परमीत में परशुराम सी थी प्रखरता।
जब से गए पापा,
परमीत का मतलब हो गया है निर्बलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत याद आते हो पापा


बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर