पत्नी


गले – से – गले मिलके,
तुमने संभाला है ओठों को.
वरना हम तो बहक ही चुके थे,
देख, शहर में मयखाने को.
मिलती है अनगिनित परियाँ,
रोज, मेरी रात बसाने को.
तुम ना होते तो बिक ही जाते,
आँचल उनका सजाने को.
कई साल बीते, यूँ ही,
एक ही साड़ी पहने- पहनते.
और हर मास, मुझे नया,
सूट तुम सिलवाती हो.
ये तुम ही हो जिसने बचाईं है,
दीवारें मेरे घर की.
पर दुनिया भर में कहती हो,
नाम मेरा, अहम मेरा बचाने को.
बाहों – में – बाहें डालकर,
तुमने ही बचाया है जीवन को.
वरना हम तो मिट चुके थे,
कब का, खाते – खाते राहों में ठोकरों को.

परमीत सिंह धुरंधर

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