जोधा और अजबदेह


नादानी ऐसी,
की कोई एक ख्वाब भी ना मिला।
बस राजपूतों में एक मैं ही हूँ,
और किसी को ये रक्त ना मिला।
भार सी हो गयी है ये जिंदगी,
किसी और के लिए जीने में.
इस राह में सब जोधा सी,
मेरे हृदय को,
किसी अजबदेह का प्रेम ना मिला।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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अजबदेह – जोधाबाई


एक जोधा के प्रेम के,
हज़ार किस्से कहने वालों.
कभी अजबदेह के त्याग की,
एक कहानी तो गढ़ के देखो.
क्षत्राणी थी, अभिमानी थी,
अपने पति की प्राण-प्यारी थी.
जोधा ने जिसका त्याग किया,
चंद सोने – चाँदी की चाहत में.
अजबदेह ने शान राखी,
पुरखों के उस निशानी की.

परमीत सिंह धुरंधर