जहाँ माँ ही मिठाई भी है


बुलंदियों का नाम है गरीबी,
जो टूटे ख़्वाबों में भी जिन्दा रखती है.
ये ऐसा दर्द है,
जो अमीरों की बस्ती में नहीं,
गरीबों  के साथ रहती है.
जहाँ काटती है,
माँ आज भी अपने पेट को.
अपने बच्चे की भूख मिटाने के लिए.
नौ माह का ये दर्द नहीं,
जो सेव-अंगूरों से मीट जाए.
ये तो वो ममता है, जो
उम्र भर एक फटी साड़ी में पलती हैं.
एक माँ की कहानी है गरीबी,
जो रौशनी में नहीं, मैगज़ीन के कवरों पे नहीं,
टूटी चारपाई, और जुगनू में चमकती है.
जहाँ उबलते नहीं हैं चावल,
बिना हाथ, चूल्हे में जलाए।
जहाँ पकती नहीं है रोटी,
बिना चक्की में जवानी पिसाय।
जहाँ चढ़ती नहीं है, जवानी,
बिना माँ के हाथ से खाये।
जहाँ पचता नहीं पानी भी,
बिना माँ के लोरी सुनाय।
की एक जन्नत सी है गरीबी,
जहाँ माँ ही मिठाई भी है.
ये ऐसी मोहब्बत है यारों,
जो अमीरों की किस्मत में नहीं,
बस गरीबों की झोली में हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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