केजरीवाल


रिश्ते जो,
गुनाहों की चादर में लिपटे हुए हैं,
अंधेरों में भी पर्दा रखते हैं.
आँखों में, हया-शर्म,
कुछ भी नहीं है उनके,
फिर भी जमाने से घूँघट रखते हैं.
कौन कहता है की,
शातिर होतें हैं कातिल,
अरे इस बस्ती से तो,
एक -दो ही केजरीवाल बनते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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