मोहब्बत में बस राम का नाम लिखा है


मोहब्बत में सभी ने
बस राम का नाम लिखा है.
पिता के प्रेम में
जो वन चले गए.
पत्नी के प्रेम में
सागर बाँध गए.
भाई के प्रेम में
जो विकल उठे.
और प्रजा के प्रेम में
विरह में जल गए.
मोहब्बत में सभी ने
बस राम का नाम लिखा है.

गुरु के आदेश पे
शिव-धनुष तोड़ दिया।
पत्नी के आदेश पे
एक – पत्नी -व्रत का निर्वाह किया।
माँ के आदेश पे
अपना हक़ छोड़ दिया।
दोस्त की याचना पे
कलंक को शिरोधार्य किया।
मोहब्बत में सभी ने
बस राम का नाम लिखा है.

परमीत सिंह धुरंधर

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15 अगस्त पे गौरेया बोली


मुझे पंक्षियों में
गोरैया बहुत पसंद है.
पर मैंने कभी ये जानने
का प्रयास नहीं किया
की गौरेया को क्या पसंद है?

ये मेरा अहम् था
या पौरष का दम्भ
मुझे नहीं मालुम।
पर कुछ था मेरे अंदर
जो कहता था की
गौरेया तो एक स्त्री है
स्त्री का परिचायक है
जो सूचक है
कमजोर और छोटे होने का.

मैं सोचता था
या मेरे अंदर का वो निराकार
अदृश्य परुष कहता था
की मैंने इसे पसंद कर लिया
ये तो इसी में खुश हो जायेगी
ख़ुशी से मर जायेगी।

आज १५ अगस्त पर मैंने जाने क्यों?
सोचा, चलो गौरेया से पूछ लें
की भला वो क्या सोचती है?
खुश है ना वो.
पूछना तो एक बहाना था
अपनी आत्मतृप्ति का
अपने दम्भ की नई सृष्टि का.

खैर, गौरेया से पूछा
कुछ पल की मौन दृष्टि के बाद
गौरेया बोली।
उसे कुछ पसंद करने की आज़ादी कहाँ?
कहाँ पुरुषों में?
पंक्षियों जैसी विविधता
कहाँ पुरुषों में
पंक्षियों जैसी सहनशीलता।
एक आह के साथ
गौरेया ने कहा
शायद सृष्टिकर्ता भी एक
पुरुष रहा होगा।

परमीत सिंह धुरंधर

शहीदे – आज़म भगत सिंह और दुल्हन


काट – काट दांत से
बेहाल कर रहे मुझे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

क्या सम्भालूं मैं चुनर?
और क्या चोली के बटन?
तोड़ – तोड़ भेंक रहे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

शर्म की बेड़ियों में
जकड़ा मेरा यौवन
तार – तार कर रहे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

जोश है, उमंग है
ह्रदय है दोनों संग में
नया भविष्य गढ़ रहे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

प्राचीन परम्पराओं
की पराधीनता के खिलाफ
शंखनाद कर रहे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

नस – नस में विजलियाँ
अंग – अंग में रक्तचाप
क्षण – क्षण में भर रहे
१५ अगस्त को
साजन मेरे सेज पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताजमहल


गुलिस्तां में हो-हल्ला बहुत है
की वो मौन हो जाती हैं
एक पत्थर फेंक के.

अंदाजे – हुस्न का शिकवा मत करों
शौहर चुनेगीं वो किसी एक को
शहर के हर चूल्हे पे अपनी रोटी सेंक के.

राजनीति और मोहब्बत के चाल – ढाल एक से
वादे और नजर बदल जाती है
एक रात की भेंट से.

हुस्न के इरादों का अगर पता होता
ताजमहल नहीं बनाते मुमताज के
कब्र की रेत पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिराक हम हो गए


जवानी के दिन थे और कुर्बान हम हो गए
उसकी एक नजर के आगे फिराक हम हो गए.
वो खिलने लगी हर दिन दोपहर सा
और रातों को ना बुझने वाला चिराग हम हो गए.

कसने लगा था अंगों पे उसके वस्त्र
ठहरने लगा था पाने – जाने वालो का उसपे नजर.
किस्मत में जाने वो किसके थी
मगर कुछ दिनों के बादशाह हम हो गए.

Dedicated to Firaq Gorakhpuri……

परमीत सिंह धुरंधर

प्रमाण क्या


समाहित कर हर एक धारा को
जो अब भी खरा हो
उसकी विशालता का फिर प्रमाण क्या?
और जो उस विशाल ह्रदय को
कम्पित कर दे क्षण भर में
उस धनुषधारी की समूर्णता का फिर प्रमाण क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेवा दोनों की निःस्वार्थ कीजिये


दर्द में हर दिल का पैगाम लीजिये
तन्हाई में बस प्रभु का नाम लीजिये।

असंभव क्या, और संभव क्या है?
बिना परवाह के परमार्थ कीजिये।

बूढी माँ हो या बूढी गाय हो
सेवा दोनों की निःस्वार्थ कीजिये।

वीरों की परिभाषा बस एक ये ही
राम सा धीर और धनुष दोनों धारण कीजिये।

योगी कोई नहीं मेरे शिव सा
अमृत छोड़ कर विष का पान कीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर