Ozlum


Ozlum – Ozlum
मधुरम – सुंदरम।
You are a beauty like Jhelum,
Ozlum – Ozlum
मधुरम – सुंदरम।

You are a beauty like Jhelum,
Which is a river in Panjab,
but still flows in the heart of everyone.
Ozlum – Ozlum
मधुरम – सुंदरम।

Your eyes reminisce me,
The battle of Hydaspes,
Between the great Alexander and Porus.
Ozlum – Ozlum
मधुरम – सुंदरम।

 

Parmit Singh Dhurandhar

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अमीर की बीबी


तन्हाई में अब कभी याद कर लेती हैं वो पुराने गुजरे दिन,
अमीर की बीबी बनकर सेज पर शायद उन्हें,
इस गरीब का चुम्बन याद आया होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गाँधी जी और भगत सिंह


अधिकारों की मांग बस प्रतिकार से नहीं होगा,
प्रहार भी करना होगा उनपे,
उनके मनुहार और गुहार से नहीं होगा।

जो कहते हैं की ये बस गाँधी की देन है,
उन्हें गुलामी और आजादी के फर्क का,
कभी एहसास नहीं होगा।

उन्हें दिखा दो कभी तस्वीरें,
तिब्बत और दलाई लामा की,
फिर उन्हें अहिंसा से आजादी प्राप्ति का,
झूठा अभिमान नहीं होगा।

उन्हें भी एहसास है कहीं – ना – कहीं,
गाँधी जी की इस गलती का,
वरना छोड़ कर सारे क्रांतिकारियों को,
उनके लबों पे भगत सिंह का जय – जयकार नहीं होता।

अधिकारों की मांग बस प्रतिकार से नहीं होगा,
प्रहार भी करना होगा उनपे,
उनके मनुहार और गुहार से नहीं होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

चिड़िया


खेत में उड़Sता चिड़िया,
डाल पे झूलSता चिड़िया,
दाना – दाना चुग के,
देख अ चहकअता चिड़िया।
त आव अ ना गोरी कहिओ बथान में,
चहकल जाई दुनो गोरा साथ में,
बन के चिड़िया, बन के चिड़िया।

तिनका – तिनका तान के,
बनावे घोंसला।
गुटर – गुटर होइ जब,
छाई आई बदरा।
त आव अ ना गोरी कहिओ सजके बथान में,
गुटर – गुटर कइल जाए दुनो गोरा साथ में,
बन के चिड़िया,बन के चिड़िया।

Dedicated to Chipko Aandolan or Movement, India.

परमीत सिंह धुरंधर

बड़ी तगड़ी बिहारन है


बड़ी तगड़ी बिहारन है,
आँखों में आँखे डाल के,
बुलाती चम्पारण है.

तीखी है, कटीली है,
सुलगने को तैयार,
गोबर की गैंठी है.
बस माचिस लगाने को,
बुलाती अपने आँगन है.
बड़ी तगड़ी बिहारन है,
आँखों में आँखे डाल के,
बुलाती चम्पारण है.

अम्मा उसकी काली,
अब्बा उसके काले।
कालों की खानदान में,
बस एक वो ही गोरी – चीटी,
बंजारन है.
बड़ी तगड़ी बिहारन है,
आँखों में आँखे डाल के,
बुलाती चम्पारण है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अगर लालू भी पैदा हो


अगर लालू भी पैदा हो,
तो कोई उसे हरा नहीं सकता।
बिहार की धरती को कोई,
बंजर बना नहीं सकता।

शुभारम्भ कैसा भी हो?
याद कर लो: गांधी का चम्पारण, जय प्रकाश नारायण।
शुभारम्भ कैसा भी हो?
किसी का भी हो,
बिहार से जुड़े बिना,
सफल हो नहीं सकता।

जो ये कहते है की,
सत्ता की चाभी यूपी से होक जाती है.
देख लो: नायडू को छोड़ सकते है, नितीश को नहीं।
उन्हें पता नहीं की एक बिहारी,
अयोग्य दामाद को अयोग्य बुला नहीं सकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर