Ego and Logic


If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% correct.
I think too,
I am a genius.
If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% logical.
I think too,
I am a champion philosopher.
So, if you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.

 

Parmit Singh Dhurandhar

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मेरी प्रियतमा है एक धोबन


मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नश -नश में मेरे है बिहारीपन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैं शिष्य रहा हूँ Prof. Sitaramam का,
किया हैं उनसे ही विज्ञान का अध्यन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नित प्रातः करता हूँ,
गुरु गोबिंद जी को नमन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैंने किया है लालजी सिंह के समक्ष,
भोजपुरी में गायन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
पहुँचा हूँ यहाँ तक, छूकर,
माता – पिता, गुरु Kasbekar के चरण.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे लावणी है बहुत ही पसंद।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरे ह्रदय में बसते है,
लाला, करद, पवार, मराठी मानुस गन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरी प्रियतमा है गावं की,
अनपढ़ -गवार एक धोबन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे भाता है उसका अल्हड़पन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
वो जो मुस्करा के हाँ कह दे तो,
ले जाऊं उसे बिहार, बना के दुल्हन।

परमीत सिंह धुरंधर

राधा सा मन में बसा कर


तुम इश्क़ ही क्यों करते हो मुझसे?
मेरी जिस्म पे नजरे गड़ा कर.
तुम मिलो मोहन बन कर कभी मुझे,
राधा सा मन में बसा कर.

दो दिनों की कहानी है,
ये मस्ती ये मेरी अंगराई।
क्यों जीवन भर रोना चाहते हो?
बेवफाई के किस्से सुना कर.
तुम मिलो श्याम बन कर कभी मुझे,
ले जाओ मेरी चुनर – चोली चुरा कर।

प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है,
इस कुदरत की और कोई तस्वीर।
तुम उम्र भर क्यों भटकना चाहते हो?
माँ का आँचल भुला कर.
तुम मिलो यशोदा – नंदन बनकर कभी मुझे,
खाने को मेरा माखन चुरा कर.

तुम इश्क़ ही क्यों करते हो मुझसे?
मेरी जिस्म पे नजरे गड़ा कर.
तुम मिलो मोहन बन कर कभी मुझे,
राधा सा मन में बसा कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार और उत्तर प्रदेश


हम वो हैं जिसको चुना है देवों ने,
हम तो वो हैं जिसको सहा है देवों ने.
जब ग्रसित हुईं अभिमान से इंदिरा,
तो एक बृद्ध चला था जगाने गावं -गांव को.
हंस रहा था जब पूरा उत्तर प्रदेश उस पर,
तब सहारा दिया था बिहार के नौजवानों ने.
ज्ञान में हमने दिया मिथिलांचल,
शान उसकी क्या सहेगा कोई पूर्वांचल?
शंकराचार्य को परास्त किया था इसी आँगन में,
गांधी को भी दिया था हमने अभिमान इसी चम्पारण में.
जब उतरने को थी धरती पे गंगा,
बोली, इसी बिहार से जाउंगी।
जानकी भी बोली राम से, तभी बनूँगी आपकी,
जब डोली मिथिला से जायेगी।
दिनकर की आवाज यही से, नागार्जुन का तेवर यही से,
राजेंद्र प्रसाद से चंद्रशेखर,
हर बगावत की शुरुआत यही से.
बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद यही के,
फिर किस पे इतना दम्भ तुम्हे?
चन्द्रगुप्त, आज़ाद शत्रु, अशोक यही के,
इतहास से वर्तमान तक कोई नहीं है हमसे आगे.
बिहार को तुच्छ समझने वालों,
तुच्छता का प्रमाण यही ही,
की हर वार पड़ी है धर्म की नीवं यही पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आलू – बैंगन – कांदा


दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुम्हे सैंडल भी दिलाऊंगा,
तुम्हे गहने भी पहनाउंगा।
लेकिन पहले सम्भालो आके,
मेरा चूल्हा – चौकी – चाका,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तेरे ओठों से लगा के,
हर रंग चखूँगा.
तेरी जुल्फों से बांध के हर,
खवाब रखूँगा।
लेकिन पहले सीख ले चलाना,
बेलन – छुरी -काँटा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुझे दिल्ली भी घुमाऊंगा,
तुझे पिक्चर भी दिखाऊंगा।
लेकिन पहले सीख ले बनाना,
आलू – बैंगन – कांदा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बक्ष


उनकी साँसों में मेरी सल्तनत बसती है,
यूँ ही उनके बक्ष, नहीं हैं निशाने पे जमाने के.
जाने कब मेरा अहंकार तोड़ पायेगा ये जमाना,
हम तो सोते हैं उनके बक्षों पे ही अपना सर रख के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लाड़ली


बाबुल तुझसे दूर जा रही है,
तेरी लाड़ली अनजान बनके।
नए धागों में ही बांधना था,
तो क्यों संभाला था दिल में?
अपनी जान बोलके।
मैं हंसती थी, तो तुम हँसते थे.
मैं रोती थी, तो तुम रोते थे.
रिश्ता था अगर वो सच्चा,
तो क्यों बाँट दिया आँगन?
मुझे अपना सौभाग्य बोलके।
अब किससे दिवाली पे तकरार होगी?
रूठ कर किसपे प्रहार करुँगी?
याद आवोगे जब इन आंशुओं में,
तो किसके सीने से दौड़ के लगूंगी?
अगर मैं हूँ खून तुम्हारा,
तो क्यों सौंप रहे हो गैरों को?
अपनी शान बोलके।

 

परमीत सिंह धुरंधर