क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त है मुझे


बस गगन के वास्ते हो राहें मेरी,
फिर चाहे आमवस्या में हो या राहें पूर्णिमा में।
उम्र भर चाहे ठोकरों में रहूँ, कोई गम नहीं,
मगर मंजिलें मेरी राहों की हो आसमाँ में।
तारें चाहें तो छुप लें,
चाँद चाहे तो अपनी रौशनी समेट ले.
हो प्रथम स्वागत चाहे अन्धकार में मेरा,
मगर प्रथम चुम्बन उषा का हो आसमाँ में.
पाला -पोसा गया हूँ छत्रसाया में धुरंधरों के,
तो क्यों ना अभिमान हो मुझे?
लहू तो सभी का लाल है यहाँ,
मगर एक इतिहास खड़ा है मेरे पीछे।
यूँ ही नहीं तेज व्याप्त है मेरे ललाट और भाल पे,
क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का
आशीर्वाद प्राप्त है मुझे।
मेरा अपमान क्या और सम्मान क्या भीड़ में?
जब तक मेरे तीरों का लक्ष्यभेदन हैं आसमाँ में.
अंक और केसुओं की चाहत में रेंगते हैं कीड़े भी,
फिर मैं क्या और और अफ़सोस क्यों ?
जब तक लहराता है मेरा विजय-पताका आसमाँ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Sitaramam के चेले हैं


Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.
धुंआधार बारिस में भी,
बिना छतरी के निकले हैं.
Alberts -Lodish की किताबों में,
Ramachandran plot पढ़ जाते थे.
Hitachi Spectrophotometer पे रखके,
DNA जेल दौड़ाते थे.
सुरेश, नाटू, गणेश, गलांडे के,
रेट-रटाये तोते हैं.
Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.
Simple -Simple theorem को,
complex कर के बताते हैं.
सुलझी हुई जिंदगी को,
कठिन -उलझा के रखते हैं.
शौक से Science में आएं हैं.
शौक से Science करते हैं.
Sitaramam के चेले हैं,
मत समझों की थकेले हैं.

In the memory of Prof. Sitaramam, University of Pune.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ तुम देवों की देव हो


माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.
जब तुम ही हो मेरे साथ, किसको पूजूँ, किसको धयाऊं?
पुत्र ही जब तुम्हारा हूँ, फिर और क्या पुण्य कमाऊं?
बस तुम्हारा आशीष ही माँ, मेरा ब्रह्मास्त्र, मेरा कवच – कुंडल है.
माँ तुमसे मिलना मेरा, जीवन का एक अद्भुत क्षण है.
माँ तुम देवों की देव हो, आँचल तुम्हारा मेरा परम धाम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं अपना तप दिखलाऊंगा


भारत की इस तपोभूमि पे,
मैं अपना तप दिखलाऊंगा।
तू बन के आ जा मेरी मेनका,
बरना मैं रावण सा तुम्हे हर जाऊँगा।
समझा दो तुम अपने पिता को,
की स्वीकार करे वो मुझको।
बरना मेघनाथ सा उनका तोड़ के दर्प,
तुम्हे बलपूर्वक अपनी भार्या बनाऊंगा।
तुम्हारे जिस्म से आती है उर्वशी की गंध,
मदहोस करती है मुझे,
जैसे मलय -पर्वत की पवन.
तुम मुझे अपना पुरुरवा मान,
मेरे ह्रदय को सिंचित करो.
या मैं इंद्रा सा,
तुम्हारे शील को भंग कर जाऊँगा।
अपने योवन के रस से,
मेरे रक्त को प्रवाहित करो.
इन केशुवों के भवर में,
मुझे हर क्षण समाहित करो.
तुम बन के शकुंतला,
मेरे बीज को अंकुरित करो.
या मैं विश्वामित्र सा तुम्हे,
बंजर पाषाण बना जाऊँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुलेलिया


अब मार द गुलेलिया ए हमार राजा,
कब तक खेल ब ई खेल अंखिया के.
फंस जाइ चिड़ियावा दूसर के जाल में,
जे देख अ त रही ब बस बाग़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अइसन जावानी आयिल बा


मुखिया और मुखिया के बेटा, दुनु बारानसन हमारा फेर में,
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.
एगो देता साड़ी त अ एगो देता हमके नया चोली।
बुधव से जवनका, सब केहू मांग आ ता हमारा के ही सेज पे.
अइसन जावानी आयिल बा ऐ माई हमारा देह पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कमल को पुलकित कर देंगे


हम हर तस्वीर को बदल देंगें,
सबकी तकदीर को बदल देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
कण-कण में कमल को पुलकित कर देंगे।
वो जो कहतें हैं की मेरी छवि दागदार है,
उनके गिरेवान में देखिये, कितने आस्तीन के साँप हैं.
हम दिन के ही नहीं, बल्कि उनके रातों के गुनाह को भी,
सरे आम, उजागर कर देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
जन्नत – से -जहन्नुम तक की सब राहें समतल कर देंगे।
हम योगी ही नहीं, वैरागी भीं है,
कण-कण में कमल को पुलकित कर देंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर