मेरा घमंड


मुझको अपने बिहारीपन का कितना है घमंड,
मेरी साँसों में आज भी है बस छपरा का ही गंध.
रोज नहाता हूँ कर के हर -हर गंगे,
और खाता हूँ लिट्टी-चोखा कर के सर बुलंद।
ऐसी माटी फिर ना देखि, घूम ली पूरी दुनिया,
तभी तो इस माटी पे हुआ था बुद्ध -गोविन्द का संगम।
नहीं छोड़ेंगे अपनी इस बिहार की माटी को यारों,
आवन कसम खाएं, इसे संवारेंगे मिलकर फिर से हम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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