हुस्न की नियत


हम इकिस्वी शताब्दी में आ गए,
उनको शिक्षा मिली,
उनको अधिकार मिले,
नारी आज चाँद पे पहुँच गयी.
पर हुस्न की नियत पे हम क्या लिखे?
आज भी दस-दस पुत्रियों के,
माता-पिता नहीं चाहते की,
उनका पुत्र,
किसी लड़की के प्रेम में पड़े.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बुढ़ापे का चिराग


जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शमा के आगोस में


समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बचपन से जवानी


तुम मिले, तो सबको चाहत हुई,
यूँ ही नहीं जिंदगी बचपन से जवान हो गयी.
तुम्हारी चाल देखके, बीच गयी सबकी आँखे,
यूँ ही तुम्हारे सीने पे, नहीं तलवारे तन गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिस्तर की चाहत


बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर