माँ और मास्टर जी


माँ तो दबंग है,
माँ तो दबंग है,
मास्टर जी.
कहती है, खा लो,
थोड़ा तो खा लो.
छोड़ो पढाई,
मास्टर जी.
चाहे आँगन में,
या रहूँ बथान में.
आ जाती है,
लेके पकवान हाथ में.
फिर कैसे मैं पढूं?
क्या करूँ पढाई?
मास्टर जी.
मास्टर जी भी कांप गए,
लेके छड़ी हाथ में.
बोले, कोई बात नहीं बेटा,
माँ तो सर्वोपरि है.
खा – खा के करो पढाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दबंग माँ


माँ लड़ जाए,
माँ भीड़ जाए.
कुछ नहीं समझती किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?
माँ चूल्हे पे हो,
या आँखे नींद में.
रूह तो भागती है, माँ की,
बस बच्चे के पीछे -पीछे।
अरे मास्टर जी भी डरते हैं,
कान पकड़ने से.
कहीं ज्यादा लाल हो गया तो,
सुननी पड़ेगी उन्हें दिन भर माँ से.
माँ कट जाए,
माँ मिट जाए.
अरे काट डाले माँ किसी को.
क्या गली, क्या मोहल्ले वाले?
अपने बच्चे की खातिर,
माँ,
क्या बुझती अपने पति को?

 

परमीत सिंह धुरंधर

Mother can do anything for her child. You can not explain that by any science.

#Respect_Mom_and_Not_Religion

दबंग


प्रथम भाग
रेलगाड़ी ने धीरे -धीरे सरकना शुरू कर दिया। अचानक एक बच्ची ने धीरे -धीरे रोना शुरू कर दिया। माँ ने उसे सहलाया, सीने से लगाया, पर बच्ची रोये जा रही थी. माँ ने स्तनपान कराया, दाएं- बाएं झुलाया, खुद उसे गोद में लेके, इधर-उधर चलने लगी डब्बे में, पर बच्ची भी रेलगाड़ी की गति में ही सुर मिला रही थी. डब्बे के सारे लोग देख रहे थे. अंत में पिता ने कहा की दो उन्हें वो कुछ करते हैं. शायद वो उसे लेके गेट पे जाने की सोच रहे थे. बच्ची ने बिलकुल रोना बंद कर दिया, पिता की गोद में आके. लोग हंसने लगे, पिता भी हंस कर बैठ गए सीट पे, और बच्ची को चुम – चुम कर खिड़की से बाहर दिखाने लगे. शायद बच्चों को भी पता होता है की जिंदगी का कौन सा सफर किसकी गोद में किया जाता है.
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxद्वितीय भागxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

शहनाई बजी, फेरे लगे और अब बिदाई की घड़ी आ गयी. दुल्हन सबके गले लग के रो रही थी. पिता के गले लगते ही उसने धीरे से पूछा की छोटू को ले जाऊं। पिता को जैसे गहरा धक्का लगा और नींद से जागे। तुरंत इधर – उधर देख के चिल्लाने लगे, ” छोटू, रे छोटुआ”. जैसे ही छोटू अवतरित हुआ परदे पे, पिता ने कहा की जो दीदी के साथ. छोटू तो हंस के बैठ गया गाड़ी में, पर पिता बैचेन हो गए. क्या -क्या नहीं दिया दहेज़ में बच्ची को दिखा -दिखा के! ममता से बड़ा कवच नहीं हैं औरत के लिए विप्पति में.
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxतृतीय भागxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

ससुराल में नयी दुल्हन जो भी करती, जहाँ भी जाती, छोटू को ले जाती। चुल्लाह – चौकी से लेके बर्तन, कपडा धोने तक, छोटू उसी के साथ रहता। छोटू लाख चाह ले पर उससे कोई काम वो नहीं कराती थी. शायद अपनों से बात करने से दुःख – दर्द का पता नहीं चलता। घर वाले भी अगर छोटू से कुछ कहे, पानी मांगे तो, तो वो खुद पानी का लोटा ला के छोटू के हाथ में दे के बोलती थी, ” छोटू दे दे”. छोटू अचम्भतित दीदी के इस कायापन से. चूल्हे से रोटी उतारते, सबसे पहले छोटू की थाली में. इतना तो माँ भी नहीं खिलाती थी.
एक दिन दोपहर में, थकान से थकी दुल्हन की आँख लग गयी. थोड़ी देर ही सोई थी की मन बेचैन हुआ और वो उठ गयी डर से. दौड़ के आँगन में आयी तो देखा, उसके पति छोटू को बहार धुप में खेलने के लिए डांट रहे थे. उसने दौड़ के छोटू को आँचल में ले लिया। रात को छोटू ने कहा की मुझे घर भेज दो दीदी, माँ की बहुत याद आती है. आज तक मुझे पापा ने भी नहीं डांटा और हाथ पकड़ा। अब छोटू को समझा की वो क्यों मोहल्ले में इतना शरारत करता है और कोई कुछ नहीं कह पाता। माँ कहीं भी रहे, चूल्हे पे या नींद में, उसकी आँखे बच्चे के पीछे -पीछे ही रहती है. जरा सा कुछ गड़बड़ और माँ साक्षात् दुर्गा सा, अपनी साड़ी संभालती माथे पे, पैर पटकती और चिल्लाती प्रकट हो जाती है. माँ बच्चे के लिए सीधी -सादी औरत से मौहल्ले की सबसे तर्ज तरार और दबंग बन जाती है. दीदी की लाख समझाने के बाद भी दूसरे दिन ही छोटू अपने घर, माँ से लिपट गया गाड़ी से उतरते। शायद आज छोटू को समझ में आया की शरारत बच्चे माँ की छत्रछाया में करते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

#Respect_Mom_not_religion

जाने क्यों फूलों को सींचता हैं?


दिल टूटा – टूटा सा,
समंदर ढूंढता है.
एक पक्षी घोंसले से अपने,
आसमान देखता है.
जितने भी फूल खिले हैं,
सब काँटों में घिर के.
फिर भी हर शख्श,
जाने क्यों फूलों को सींचता हैं?

 

परमीत सिंह धुरंधर

नागिन का ताप ना मिटा


सदियाँ गुजर गयीं,
वो दर्द ना मिटा।
ओठों का तेरे अब तक,
वो रंग ना मिटा।
मेरे खवाबों में आते हैं,
अब भी वो तारें।
जिनके चाँद का,
वो दाग ना मिटा।
कैसे संभाले कोई जीवन को?
नागिन का विष उतर भी जाए तो.
हाय, तन से अभी तक,
उस दंश का ताप ना मिटा,
रे ताप ना मिटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं मेघनाथ हूँ


मैं मेघनाथ हूँ, मेघनाथ,
पुरे ब्रह्माण्ड में,
कोई नहीं जो मुझे रोक सके.
मैं जब रथ पे होता हूँ,
विराजमान, सारे जहाँ में,
कोई नहीं जो मेरे अश्वो को बाँध सके.
मैं पल में पताका फहरा दूँ,
त्रिलोक में कहीं भी.
मुझसे कोई नहीं छुप सकता,
पुरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी.
मैं जब करता हूँ तीरों का संधान,
ऐसा शक्तिमान कोई नहीं रण में,
जो मेरे भीषण प्रहरों से बच सके.

 

परमीत सिंह धुरंधर