बलखना किसे कहते हैं ?


बेहयाई का ऐसा है दौर दोस्तों,
दिल में कोई और, जिस्म पे कोई और दोस्तों।
हमसे पूछो बलखना किसे कहते हैं ?
जो कल तक मेरी थी, अब किसी और की दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपना सब उतार गईं


दास्ताने-मोहब्बत क्या कहें,
वो सूरते-बाज़ार में बिक गईं.
कुछ ऐसे जिस्म की चाहत थी,
की वो सैकड़ों की बाहों में झूल गईं.
हुस्न के इसी रंग पे,
ख्वाब बिकते हैं.
उनकी साड़ी, काजल पे हमने लुटाएं पैसे,
और वो किसी के पैसों पे,
साड़ी, काजल, अपना सब उतार गईं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो प्रतिकार करना होगा


ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं


रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं,
जब से हम अपनी दुल्हन के संग हो गए हैं.
मौलवी-पंडित, सब परेशान हो गए हैं.
जब से हम अपनी बीबी संग खुलेआम हो गए हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार और परवाह


बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमने कबूतरों को छोड़ दिया है


हमने कबूतरों को छोड़ दिया है,
उड़ाना अब छज्जे से.
डोली उनकी उठ गयी,
अब क्या रखा है मोहल्ले में?
मेरा सारा प्रेम-रस ले कर,
वो सींच रही बाग़ किसी का.
हुस्न का ये रंग देख कर,
उचट गया है मन जीने से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत याद आते हो पापा


बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर