चारपाइयों की कसरत


दो पल की आरजू थी,
दो जिन्दगियाँ बदल गयीं।
उनके आँखों के काजल से,
रोशनियाँ बदल गयीं।
ठुकराती रहीं,
ता-उम्र वो मेरी मोहब्बत।
और जब भी मेले में मिलीं,
निशानियाँ बदल गयीं।
आज भी,
घूँघट में उनका चेहरा।
मगर जवानी ढलते-ढलते,
कई कहानियाँ बदल गयी.
चारपाइयों की कसरत,
भले मैंने नहीं की है.
पर दिया बुझाते-बुझाते,
कई चारपाइयां बदल गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

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