सीने पे किताबे तू रखने लगी है


राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.
नजरे झुकाकर, उमर को छुपाकर,
सांझो – पहर जब निकलने लगी है.
मंदिर – मस्जिद सब सुने पड़े हैं,
निगाहों में काजल जो तू रखने लगी है.
जुल्फों को बाँध कर, चुनरी को भींचकर,
बदल कर गलियां, आने – जाने लगी है.
कब तक बचेंगे, कितने बचा लेंगे,
घर-घर में दीवारे उठने लगी है.
बच्चों की अम्मा, बच्चों के अब्बा,
अब तो,
दादा – दादी में दरारें परने लगी है.
जब से सीने पे किताबे तू रखने लगी है.
राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.

परमीत सिंह धुरंधर

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