विक्रम और बेताल : कहानी 1


विक्रम ने बेताल को काँधे पे डाला और मौन हो के चल पड़ा. राह काटने के लिए बेताल ने एक कहानी कहनी शुरू की. एक राज्य छतरपुर  का राजा मानेन्द्र सिंह और रानी गिरजा देवी थी. गिरजा देवी बहुत ही कामुक प्रविर्ती की महिला थी, जिनका सारा दिन श्रृंगार और रास में जाता था. उन्हें न तो राज्य की चिंता थी न प्रजा की, वो तो बस भोग बिलास में लिप्त थी. मानेन्द्र सिंह भी तन- मन से गिरजा  देवी के गुलाम बन के नृत्य कर रहे थे, अपने कर्तव्यों से विमुह हो के. मानेन्द्र सिंह गिरजा देवी की तन – मन से सेवा कर रहे थे, लेकिन गिरजा की कामुक प्रविर्ती शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. इसलिए धीरे धीरे  मानेन्द्र सिंह की जवानी ढलने लगी और उनका स्वास्थय गिरने लगा. पडोसी देस के राजा को जब ये खबर मिली तो उसने छतरपुर पे चढ़ाई कर दी और मानेन्द्र सिंह की हार हुई.
मानेन्द्र सिंह को बेड़ियों में जकड कर विजयी राजा, रानी गिरजा देवी के सामने दरबार में हाजिर हुआ. विजयी राजा ने गिरजा देवी से कहा की या तो आप मृत्यु को स्वीककर कर लो या मेरी बन जाओ. रानी गिरजा देवी ने विजयी राजा देव बर्मन की ये बात स्वीककर कर ली पर उन्होंने एक शर्त रखी. गिरजा देवी ने कहा की अगर विजयी राजा और उनके राज्य का कोई एक आदमी में से जो उनके साथ ज्यादा समय गुजरेगा उनके कमरे में, वो उसकी हो जाएंगी और वो ही इस राज्य का राजा होगा. देव बर्मन बहुत हर्षित हुए की रानी उनकी बनाना चाहती हैं और उन्हें भी हर किसी के साथ ये ही लगा की वो दूसरे आदमी के रूप में अपने राजा मानेन्द्र सिंह को चुनेंगी. मानेन्द्र सिंह के चेहरे पे अचानक ख़ुशी की लहर छलक उठी. लेकिन गिरजा देवी ने अपने स्वभाव के अनुसार इस बार फिर चकमा देते हुए राज्य के मंत्री को चुना।
रानी  ने देव बर्मन से कहा की चुकी आप विजयी राजा हैं आप पहले चले मेरे कमरे में. कमरे के बाहर गणितज्ञ लोग बैठे थे समय की गणना करने को. मूछों पे ताव रखते हुए देव बर्मन रानी गिरजा देवी के कमरे में गए और आधे घंटे से कम के समय में ही निकल गए. फिर राज्य के मंत्री कमरे के अंदर गए और पुरे दो दिन बाद निकले। पुरे राज्य में लोगो में उतसाह था. देव बर्मन ने पराजय स्वीककर कर ली और अपनी सेना के साथ वापस जाने लगे. रानी गिरजा देवी ने उनके पास जाकर कहा की हमारा उपहार स्वीकार करें। उन्होंने उपहार का इसारा अपने राजा, पति, प्रेमी, मानेन्द्र सिंह की ओर किया. सभी लोग विस्मित हो गए, ख़ास तौर पे मानेन्द्र सिंह। मानेन्द्र सिंह ने रानी से कहा, “गिरजा मैंने तुम्हारे लिए क्या –  क्या कुकर्म नहीं किये और तुम आज ये कर रही हो”. गिरजा ने हँसते हुए कहा, “पुत्र, अपने पिता की सेवा करो. इस उम्र में कुछ  धर्म करो.” मानेन्द्र सिंह मौन हो गए और फिर आज तक उनकी आवाज कभी नहीं सुनी गयी.
बेताल ने कहा, “विक्रम तू तो ज्ञानी है अब उत्तर दे, वार्ना तेरे माथे के टुकड़े – टुकड़े हो जाएंगे। तो बताओं, क्यों रानी ने मानेन्द्र सिंह को पुत्र कहा और क्यों मानेन्द्र सिंह मौन हो गए. राजन ये बताओं की मंत्री को दो दिन कैसे लग गए कमरे में?”.
विक्रम ने कहा, “रानी गिरजा चरित्रवान औरत थी और उसने  भले ही मंत्री से सम्बन्ध विवाहोत्तर बनाये, पर वो सम्बन्ध तब बना जब राजन अपनी पत्नी को पत्नी का सुख नहीं दे रहे थे। सच्चाई ये है की उन्होंने मन से मंत्री को ही अपना सबकुछ मान लिया था और राजा के साथ वो सिर्फ उसके डर से थी. इसलिए एक तरह से राजा मानेन्द्र सिंह रानी का बलात्कार करने के दोषी हुए. उन्होंने कभी रानी के मन को समझने की कोसिस नहीं की. इससे बढ़ के रानी ने अपनी बुद्धि से न केवल राज्य पे आये संकट को टाला, बल्कि उसने अपने मंत्री के सम्बन्ध को प्रजा के सामने भी रखा. एक रानी के राज्य-धर्म के अनुसार सारी प्रजा उसकी संतान हुई इसलिए रानी का राजा मानेन्द्र सिंह को पुत्र कहना धर्म-संगत है. राजा मानेन्द्र सिंह ने मौन हो कर अपनी हार स्वीकार कर ली जैसे उन्होंने  युद्ध भूमि में किया था.”
विकर्म ने आगे कहा, “देव बर्मन जीत के उत्साह और घमंड में समझ नहीं पाये और उन्होंने सिर्फ राज्या को भुला कर रानी गिरजा देवी के शरीर पाने पे धयान दिया। वहीँ रानी ने मंत्री के कान में कहा की तुम रोज चोरो की तरह आते थे और जल्दी जाते थे राजा मानेन्द्र सिंह के डर से. आज मर्द की तरह आवो और मर्द की तरह जाओ. इसलिए मंत्री ने आराम से खाना खाया, पानी पिया और बिस्तर पे सोया और फिर दो दिन तक गिरजा देवी के साथ रहा. इस तरह उन दोनों ने प्रजा को दिखाया की उनका प्रेम सच्चा है, और ये केवल वासना नहीं है.”
इतना सुनते ही वेताल हँसते हुए उड़ पड़ा. वेताल, ” विक्रम तू ज्ञानी है. तूने सच बोला, पर चुकी तूने अपना मौन तोड़ा है, मैं अब जा रहा हूँ.”

यह कहानी पूरी तरह से मेरी लिखी है.

It got published on the Kavyasagar website also. Here is the link

http://kavyasagar.com/kahani-by-parmit-singh-dhurandhar-2/

 

परमीत सिंह धुरंधर

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