राखी और करवा चौथ


राखी के बंधन को कैसे निभाए कोई,
अब करवा चौथ का खर्च भारी पर रहा है.
राखी मनाई जा रही है अब व्हाट्सऐप और फेसबुक पे,
मगर मंगलसूत्र आज भी सोने का माँगा जा रहा है.

परमीत सिंह धुरंधर

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हुस्न


मोहब्बत की,
बस आरजू रखतें हैं.
हम आज भी,
अपने सीने पे काबू रखते हैं.
गुजरती हैं कई जसलीन,
मेरी गलियों से रोज.
करीब जाके भी,
हम उनके दुप्पटे से,
एक दुरी रखते हैं.
हारें हैं जिस हुस्न से,
इस खेल में कई सबरजीत यहाँ।
वो पर्दानशीं भी,
इन राहों में,
बस परमीत से खौफ रखते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

रखा है तिरंगा आज भी आसमानों में


हम वीर नहीं तो क्या हैं भला?
बोलों, इस आँगन के.
हम लड़ते रहें,
हम भिड़ते रहें।
जब उजड़ रहे थें,
सब तूफानों में.
तुर्क आएं, तैमूर आएं,
मुग़ल के पीछे, अंग्रेज आएं.
वो कुचलते रहें,
चुनवाते रहें,
हमें जिन्दा ही दीवारों में.
हम टूटते रहें,
हम बिखरतें रहें।
पर बढ़ते रहें,
इन राहों में.
हम जलते रहें,
झुलसते रहें।
पर चढ़ कर,
बलिदानों की वेदी पर.
रखा है तिरंगा,
आज भी आसमानों में.

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परमीत सिंह धुरंधर

हिन्दुस्तान


ना हिन्दू, ना मुसलमान,
ये वतन है हिन्दुस्तान।
यहाँ वीरों की गाथा पहले,
फिर बाद में वेद और कुरान।
यहाँ पहले विस्मिल -असफाक,
फिर बाद में,
मंदिर – मस्जिद के ज्ञान।

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परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र II


कर्म ही जीवन,
कर्म ही साधन।
कर्म ही,
मानव का संसाधन।
कर्म ही साँसे,
कर्म ही आँखें।
कर्म से ही,
मानव का भाग्योदय।
कंटीले पथ पे,
कर्म ही राही।
मृत्यु-शैया पे,
कर्म ही साथी।
कर्म ही पुण्य,
कर्म ही पाप.
कर्म ही,
मानव का लाभ.
कर्म ही वेद-पुराण,
कर्म ही गुरु-ज्ञान,
कर्म ही,
मानव का अभिमान।
कर्म से बंधे है सभी,
कर्म से उठे, और मिटे है सभी.
कर्म से ही, सजा,
ये कुरुक्षेत्र है.
इस कुरुक्षेत्र में भी,
सबमे भेद, बस उनका कर्म है.

परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र


मेरा विस्तार देख,
मेरा आकार देख.
मैं ही हूँ सृष्टि,
आज मुझको साक्षात देख.
आँखों से अपने,
ज्ञान को मिटा के.
मूरख बनके तू,
मेरा प्रमाण देख.
सब कुछ मेरा है,
मुझसे बना है.
एक दिन सबको फिर,
मुझमे ही मिलना है.
तेरा है क्या यहाँ,
तूने क्या रचा है.
जिसके मोह में तू,
इतना बंधा है.
तेरा ये ज्ञान,
ये तीर – कमान।
सब मेरा है,
मुझसे बंधा है.
मैं न जो चाहूँ,
तो न गांडीव हिले।
न तुझसे,
एक भी तीर चले.
शुक्र कर मेरा तू,
ए मूरख।
मैंने अपने इस यज्ञ में,
बस तुझको ही पुरोहित चुना है.
मैं ही हूँ द्रोण में,
मैं ही हूँ कर्ण में.
मैं ही हूँ भीम का बल,
मैं ही दुर्योधन – धृतराष्ट में.
मैं ही पालक विष्णु,
मैं ही संहारक शिव हूँ.
मैं शिशु के भूख में,
मैं ही हूँ माँ के दूध में.
जब मुझको ही मोह नहीं,
अपनों के नाश का.
जब मुझको ही भय नहीं,
मेरी रची सृष्टि के सर्वनाश का.
फिर क्यों तू इतना,
इनसे बंधा है.
जिनके प्रेम में तू,
इतना जकड़ा है.
उनके ही तीरों पे,
तेरा नाम चढ़ा है.
फिर तू क्यों इतना,
अपने कर्म – पथ से डिगा है.
तूने देखा है अब तक,
प्रेम मेरा।
आज मेरे संग,
मेरी लीला भी देख.
तूने देखा है,
द्रोण – भीष्म की शक्ति यहाँ।
अब इस धरा पे,
उनकी मुक्ति भी देख.
बिना सुदर्शन के,
मेरी युद्ध – नीति भी देख.
सबके प्रेम में बंधा हूँ मैं,
मगर मेरी आत्मा की,
इनसे मुक्ति भी देख.
बढ़ मेरे साथ आज इस पथ पे,
मेरे ह्रदय में प्रज्जवलित अग्नि को देख.
ये सर्वनाश नहीं,
एक आरम्भ है.
मेरे साथ तू आज,
एक नए युग का शुभारंभ भी देख.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार


मैं रातों को जलता रहा,
वो दिन भर सुलगती रहीं।
ये प्यार ही तो है जिंदगी,
की हम मिल भी न सके दो घड़ी.
वो मुड़ – मुड़ के देखती रहीं,
मैं हर पल राहें बनता रहा.
ये प्यार ही तो है जिंदगी,
की हम चल भी न सके संग दो घड़ी.

परमीत सिंह धुरंधर