माई के दुलारी पिया के आस में


धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
गावं – गावं उमरत नदी रहली जे,
आज उनकर कोठारी में पड़ाव भइल बा.
भूख मिटल, प्यास छुटल, देखत – देखत,
बाबुल के आँगन के चिड़िया उड़ गइल बा.
एगो हल्दिया, अइसन मिलल रे,
तन पे चढ़ल, आ मन रंगल रे.
काजल फीका पड़ल, गजरा फीका पड़ल,
देखत – देखत, दर्पण भी सौतन भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
माई के दुलारी पिया के आस में,
जल अ तारी चिपरी जैसे आग में.
नाज – नखरा रखस योवन पे जे,
उनकर अपने अंग – अंग से अब बैर भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

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