माँ


धीरे – धीरे कहता हूँ मैं अपने आँखों के समंदर से,
अगर बहना ही है तो मेरी माँ के चरणों को धो दे.

परमीत सिंह धुरंधर

Advertisements

नैहर के चोर


गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.
चल जा तानी रोजे बथानी,
हमरा के अकेले छोड़ के.
आव अ ता आधी रात के,
दे ता देहिया झकझोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
काहे ना चिल्लाइलु तू,
आवाज देहलू बढ़ के.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा भाइल ई चोर बा.
मुँहवा दबले रहल हमार,
अंगिया पे रखले रहल धार हाँ.
चूड़ी तुरलख, कंगन छिनलख,
ले गइल नथुनिया तोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा त लॉग अ ता रानी,
तहरा नैहर के कउनौ जोड़ हाँ.
गली – गली में शोर बालम जी,
धरती पे एगो चोर बा.
लूट अ ता रोज हमर खजाना,
अइसन उ मुँहजोर बा.
हमरा रहते ये रानी,
केकर तहरा पे जोर बा.
हमरा त लॉग अ ता,
की तहरे मन में कउनौ चोर बा.

परमीत सिंह धुरंधर

अजबदेह – जोधाबाई


एक जोधा के प्रेम के,
हज़ार किस्से कहने वालों.
कभी अजबदेह के त्याग की,
एक कहानी तो गढ़ के देखो.
क्षत्राणी थी, अभिमानी थी,
अपने पति की प्राण-प्यारी थी.
जोधा ने जिसका त्याग किया,
चंद सोने – चाँदी की चाहत में.
अजबदेह ने शान राखी,
पुरखों के उस निशानी की.

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर

तेरा दिल टूटे ना


हर रिश्ता,
छूटे तो छूटे।
तेरा संग छूटे ना.
हर बंधन,
टूटे तो टूटे,
तेरा दिल टूटे ना.
पथ चाहे पथरीली हो,
या फूलों से सजी.
तेरे क़दमों पे,
मेरे जीते जी,
कोई जख्म आये ना.

परमीत सिंह धुरंधर

ये प्रेम निभा दो


तुम अपनी पलकों से,
मेरी यादों का,
हर सफर मिटा दो.
मुझे तन्हा – तन्हा करके,
मेरा संसार,
अपनी बाहों में बसा दो.
हर सुबह छलके,
तुम्हारा योवन मुझपे।
हर रात,
अपने ओठों का,
मुझे जाम पिला दो.
छोड़ के अपनी हर,
शर्म – हया को.
इन सर्द भरी रातों में,
मेरे तन पे,
अपना आँचल ओढ़ा दो.
क्या मज़बूरी,
क्या रस्मो को निभाना।
हर रिस्ता भुला के,
जीवन भर का,
ये प्रेम निभा दो.
तुम बनके मेरी शाम्भवी,
ये जीवन मेरा,
सम्पूर्ण बना दो.
तुम अपनी पलकों से,
मेरी यादों का,
हर सफर मिटा दो.
मुझे तन्हा – तन्हा करके,
मेरा संसार,
अपनी बाहों में बसा दो.

परमीत सिंह धुरंधर

एक दीप ही संग जला ले


मेरे प्यासे मन को,
तू अपने अंग लगा ले.
कुछ नहीं तो एक रात,
एक दीप ही संग जला ले.
मैं बैठा रहूँ,
उलझ के तेरी आँखों से.
तू मेरे सीने पे,
अपनी ये जुल्फ बिखरा ले.
तू खनका ये कंगन,
तू छनका ये पायल।
सारी रात, सारे जीवन,
बस मेरी धड़कन से तू ताल मिला के.
मुझे रख तू भूखा, प्यासा,
मेरे तन को भी बाँध के.
मगर अपने अधरों से प्रिये,
दो-दो बून्द चटा के.

परमीत सिंह धुरंधर