प्रणय की रात


ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.
दूर तक हैं रौशनी,
बिना चाँद के ही आसमानों में.
हवाएँ भी उठने लगीं,
न जाने क्यों साथ मेरे बहने को.
हर दर्द है मिट रहा,
बिना मेरे फरियादों के.
ग़मों की रातें, हैं छट रहीं.
कोई आ रहा हैं ख़्वाबों में.

परमीत सिंह धुरंधर

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