चंद्रशेखर आज़ाद


सारे जमाने से दुश्मनी है,
हर गली में एक दुश्मन है.
जाने कब, किस गली में,
कोई घात लगा दे ?
ऐसे में जब घर लौट के,
रात का खाना खा लेता हूँ.
एक अजब सा अहंकार ह्रदय में,
उठ जाता है.
मुझे बाँध सके, ऐसी कोई हवा नहीं,
और इस तन पे,
जब तक जिन्दा हूँ मैं,
उनका कोई जोर नहीं.

परमीत सिंह धुरंधर

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कुत्ता और चाँद


कुत्ते दौड़ते हुए गलियों में,
उनका रूप चुराने को.
अम्बर पे चाँद हंस रहा,
देख अपने दीवानों को.
कुत्तों की किस्मत में नहीं,
चाँद से अपने मिल पाना।
ना चाँद के भाग्य में है,
इन कुत्तों जैसा कोई दीवाना।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जली राहें,
जो काली राखों से ढकीं हैं.
हरे पत्तों और पुष्पों से बंचित,
पक्षियों के कलरव से रहित हैं.
ना ये प्रतिक हैं,
अन्धकार का,
ना किस्मत का,
ना हार का.
ये तो चिन्ह हैं,
उस संघर्ष का.
जहाँ, झुलस गए,
पर झुके नहीं।
मिट गए पर मुड़े नहीं।
मौत तक डटे रहे,
मगर पथ से हटे नहीं।
ये उत्साह है,
उत्सव है,
प्रेरणा है,
हम जैसे नवजवानों का.
जिनके लिए जिंदगी सिर्फ सफलता नहीं,
प्रयास हैं,
एक और असफलता का.
आदि है,
एक और सफर के अन्त का.
चाह है,
एक और विरह का,
अलगाव का.
जहाँ जिंदगी पैसो की चमक,
कंगन की खनक नहीं।
जुल्फों की छावं और ओठों का जाम नहीं।
जहाँ जिंदगी मरूस्थल की प्यास,
कीचड़ सी उदास,
हो कर फिर भी,
एक बुझते दिए का,
जलते रहने का,
एक आखरी प्रयास है.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम और वासना


स्त्री को प्रेम जवानी में और मर्द को बुढ़ापे में होता है. एक को हमने चरित्रहीनता तो दूसरे को वासना का नाम दे दिया है, जबकि प्रेम की और दूसरी अवस्था सिर्फ और सिर्फ दोनों की मज़बूरी है. उसे रोकने के लिए हम वफ़ा, इज्जत, और समाज की दुहाई देते हैं और हमें रोकने के लिए वो उम्र, परिवार,  और अपने बच्चों की दुहाई।

परमीत सिंह धुरंधर

गरीब बनके रहना नहीं है


किसी भी हालात से डरना नहीं है,
मौत भी समक्ष हो,
तो हटना नहीं है.
चंद साँसों के लिए,
क्या समझौता करें हम,
अँधेरी राहों में भी हमें रुकना नहीं है.
तुझको मुबारक हो ए साथी,
ये गुलिस्तां,
तेरे बाहों के लिए हमें पलटना नहीं है.
धरती पे आएं हैं तो दलें जाएंगे,
या दल के जाएंगे,
भय से बंध के हमें सिकुरना नहीं है.
कुछ भी मिले या न मिले हमको,
पर अमीरों की बस्ती में,
गरीब बनके रहना नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे सैया


मेरे सैया के नखरे हज़ार,
पियर धोती पे आएं हैं ससुराल।
सास से मांगे हैं हीरा-मोती,
साली-सरहज में दिल है बीमार।
ससुर से है रूसा-रुस्सवल,
और साल से करते हैं खिलवाड़।
मेरे सैया के नखरे हज़ार,
बीच आँगन में करते हैं मुझको परेशान।
मेरे सैया के नखरे हज़ार,
पियर धोती पे आएं हैं ससुराल।

परमीत सिंह धुरंधर