खूबसूरत ह्रदय


खूबसूरत है जो ह्रदय,
वो सजता-सवरता ही नही.
सजने-सवरने वालों में,
कोई ह्रदय ही नहीं.
मैं कल भी चूड़ी लाया था,
मैं आज भी कंगन लाया हूँ.
आइना भी इंतज़ार में बैठा है,
चूल्हा है की भुझता ही नहीं.
सुबह थक कर चली गयी,
रात ऊब कर ढल गयी.
गजरा भी अब सुख गया,
बेलन-चौकी उनकी थकती ही नही.

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


सर्द रातों में जब जिस्म कराहता है,
तो गोरे-काले में भेद मिट जाता है.
और जब अतड़िया पिसती हैं भूख से,
तो मंदिर-मस्जिद में भेद मिट जाता है.
बच्चा ढूंढता है बस माँ का स्तन, तब
पशु और इंसान में भेद मिट जाता है.
धर्म और मजहब की लकीर ढूढ़ने वालो,
जब मौत आती है,
गिद्ध नाचने लगते हैं,
तो धर्म का हर भेद मिट जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


सुबह में देखि सीरत,
शाम को देखि सूरत.
बदले- बदले से,
दोनों लगे.
तब जाके समझी
कीमत.
सुख-दुःख में साथ देने का,
मीठा बोल बोलके.
जब जेब हुई खली,
सेज ही वो बेच गए.
अमीरी में देखि सोहरत,
गरीबी में देखि जिल्लत,
बदले – बदले से,
दोनों लगे.
तब समझी,
उनकी मोहब्बत.

परमीत सिंह धुरंधर

उन्हें बेवफा मत कहो


उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
सीरत से न सही, सूरत से तो हो गयी.
बाढ़ में डूब जाते हैं कितने ही किनारें,
क्या हुआ?
जो कुछ वो भी डूबा गयीं.
दिल से न सही, जिस्म से तो हो गयीं.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
कैसे काटे कोई जीवन, किसी एक के साथ,
इसलिए,
किसी को निगाहें, किसी को अपने होठ दे गयी.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

काफ़िर और ताज


सुबह के इंतज़ार में रात भर बैठे रहें,
काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो एक दिया तक नहीं जला पाएं.
इनसे अच्छे तो वो हैं,
झूठा ही सही, कुछ ख़्वाब तो देखते हैं.
एक की मोहब्बत में, ताज बना गए,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितनों का पेट कुचल गए.
ऐसी मोहब्बत किस काम की?
उनकी जुल्फों का शौक किस काम का?
वो बदलती है गजरा,
अपने हर रात की शौक में,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितने भौरों को मार गए.

परमीत सिंह धुरंधर

कालेज में एक नया चेहरा


कालेज में एक नया चेहरा,
मजनुओं के महफिल में,
जोश जगा गया.
जो मिट गए मोहब्बत में,
वो किसी काम के नहीं.
पर इन बचे हुए, दबे, हारे,
कुचलों के मन में,
इंकलाब जगा गया.
कुछ खास नहीं,
बस एक दुप्पट्टे में हैं,
इस उजड़ी हुई बस्ती में,
एक चाँद सी हैं.
की एक,
चलना ही देख कर उनकी,
बहक रहे हैं यहाँ सभी,
एक झलक उनकी,
कब्र में जाने से पहले,
जन्नत दिखा गया.
अब साजिस रची जाएंगी,
किस्से गढ़े जाएंगे,
जीते-जश्न, गमे-हार,
के दौर भी आएंगे।
मगर, उदास चेहरों,
बुझती जवानी,
इन अँधेरी रातों में,
कोई फिर से आज,
सुनहरे भविष्य और,
मीठे ख़्वाबों का,
एक दिया जला गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर