भीष्म-अभिमन्यु


मूंद रही आँखे,
देख रही थी,
पिता को आते.
की पिता आके,
बचा लेंगें.
अंतिम क्षणों तक,
इस उम्मीद में,
लड़ा अभिमन्यु,
पिता-पुत्र का रिश्ता,
कुछ ऐसा ही है,
एक तरफ भीष्म गिरें हैं,
तो एक तरफ जूझ,
रहा है, परमीत, अभिमन्यु.

सुनहरे पल


सुनहरे पलों की याद में,
कुछ पल इस कदर गुजर गए,
की वफ़ा की उमिद्द में हम,
वेवफाई पे उतर गए.
वो मुस्करा कर बोली की,
तुमने मुझे ठगा तो जरुर,
पर एक दिन,
पछताओगे परमीत इस जमाने में,
इसी एतबार से, हम तुम्हे छोड़ रहें.

कालिदास की वो नारियां


कृषि महाविधालय के प्रांगण में,
जब कल लहरा रही थीं,
रंग-बिरंगी साड़ियां।
तो ऐसा लगा जैसे,
धरती पे आ गयी हैं,
सवर्ग से उतर कर,
कालिदास की वो नारियां।
एक सुन्दर सी साड़ी में,
लिपटा तुम्हारा बदन,
ऐसा लगा जैसे झूम रहा हो,
सारा उपवन।
वो तुम्हारा लहराता हुआ आँचल,
सागर की सैकड़ो लहरे थीं,
या खेत में लहलहाती,
गेहूं की हज़ारों बालीं।
जो भी था वो मंजर,
बहुत मनलुभावन था।
अब बस इतनी सी इल्तिजा है,
की अब जब निकालना,
फिर से इन गलियों में,
तो बसा लेना आँखों में,
हल्का सा वो काजल,
और बाँध लेना,
पाँवों में वो पायल।
ताकि गूंज उठे,
इन गलियों में,
फिर से वो ही तराना,
कहते है परमीत,
जिसे हम जैसे आशिक़
वो गुजरा हुआ जमाना।

माँ


एक पल जो रात कटे पलकों में उनके,
तो खुद तेरी खातिर मैं हज हो आऊँ.
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो मेरी आँखों को खुदा तू दीखता नहीं।
एक पल को जो रौंद दूँ जामने को,
तो सनम तेरी लबों को चुम ले परमीत,
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो सनम तेरी लबों में वो मिठास नहीं।

शहंशाह


इस गुलशन के,
हम गुलफाम है यारों,
जब हम न होंगे तो देखना,
अपना अंजाम मेरे यारों.
शहंशाह वो ही है,
जो गरीबो की दुआ ले,
अमीरों की सौगाते तो,
महफ़िलो में बँटती है.
हमने आज तक,
घूँघट नहीं उठाया,-2
दर्पण में ही उन का,
मुखड़ा देखते हैं.
ये मत पूछो की,
हम क्यों रौशनी से डरते हैं,
आजी अंधकारों में ही,
दियें पलते हैं.
हम कहीं भी रहें,
कितना भी खा लें परमीत,
भूख से बिलखते रहते हैं,
जब तक माँ के हाथ से,
निवाला न मिले.
इस गुलशन के,
हम गुलफाम है यारों,
जब हम न होंगे तो देखना,
अपना अंजाम मेरे यारों.

राजपूतों की परंपरा


हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जीवन से जयादा जमीन की चाहत है.
बंजर हो या उर्वर हो,
तन-मन को उसकी गोद में ही राहत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
दोस्तों से जयादा दुश्मनों में शोहरत है,
मारते हैं-मरते हैं,
जंग में मिले जख्मों से ही मोहब्बत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जो समर्पित कर दे वो ही महबूबा है,
सजाते हैं-सवारतें हैं, परमीत
उसकी बाहों में ही फिर जन्नत है.

Lebanon की एक लड़की


Lebanon की एक लड़की,
Lobster खाती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
आँखों में आँखे डाल के,
Red wine गटकती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
ओठों पे लिए खनकती हंसी,
घुंघराले बालो को लहराती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.
जब हमने नजरे डाली,
कही और, तो परमीत
खुद में ही, खुद से ही,
जलती हुई.
Lebanon की एक लड़की,
Lobster खाती हुई,
हौले-हौले मेरे दिल में,
उतरती गयी.