दिल


इन आसुंवों का क्या करें,
जो आज भी निकलती हैं,
तेरी ही चाह में.
कम्बखत ये दिल समझता ही नहीं,
की तुमने बसा लिया है,
किसी और को अपने दामन में,परमित

श्रींगार और परुषार्थ


घटनावों का घटित होना,
कल्पनावों का सृजित होना,
एक स्त्री का छल है,
दूजा परुषार्थ है.
सृजन है, श्रींगार है,
दोनों में निर्माण है,
मगर एक भाग्य के अधीन,
दूजा कर्म का आकार है,परमित.

प्यासा है परमित.


तेरी मस्त निगाहों से, हाँ पी कर देखा है,
दिल जलता है रातों में, जब होता अकेला है.
चाँद की चांदनी, भाती नहीं मुझे अब,
जब से तेरे रूप का नजारा देखा है.
मदिरा को भी पी कर, प्यासा  है परमित,
जब से तुझको ओठों , से लगाकर देखा है.

खत्री-खत्री, खत्री-खत्री


16- साल की एक लड़की,
मधुर सपनो को देखती हुई,
किताबों में अपने लिखती है,
Crass-Crassa।
20- साल की एक लड़की,
कॉलेज में पढ़ती हुई,
औटो में बैठे-बैठे, कहती है,
Crassa-Crassa।
25-साल की एक लड़की,
माडलिंग करती हुई,
स्टेज पर चलती, ढुंढती है,
Crassa-Crassa।
30-साल की एक लड़की,
गोद में एक बच्ची खिलाती हुई,
रब से दुआ में मांगती है, दामाद हो,
बस, Crassa-Crassa.

34 पे आकर भी.


दिल लेके बैठा हूँ, 34 पे आकर भी,
वो 26 पे कहती हैं, “आप बड़े कातिल हो जी.”
6- घंटे तक चली, सरहद पे लड़ाई,
तब जा के सवान बरसा, वो मेरे छतरी में आईं, परमित.