A love story that started 20 years back (Part 1)


41948638_10215360796206419_435698189929021440_oवो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।

घोंसलों से निकला ही था मैं,
तूने मेरे पंखों को
अनंत आसमान दे दिया।
और मैं भी उड़ता रहा – उड़ता रहा,
बिना सोचे, समझे, बिना किसी लक्ष्या के
तूने मेरे नस – नस में ऐसा उत्साह भर दिया।

वो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।

ना डर, ना भय, ना क्रोध
बस मैं और तेरा आँचल।
किताबों का शौक
दोस्तों का चस्का
ऐसा जगाया तूने
की मेरे पथ को कभी अँधेरा ढक नहीं पाया।
पथ भले कंटीला मिला मुझे
पर हौंसला आज तक टूट नहीं पाया।

वो College Of Agriculture
तुझे मेरा शत – शत बार नमन.
तेरे पावन आँगन में आकर
मैंने पाए खुशियाँ अनगिनत।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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माता का नाम सुशीला


माता का नाम सुशीला,
और पिता का नाम हो धुरंधर,
तो फिर पुत्र अद्भुत होगा ना.

उसपर माटी हो छपरा की,
तो फिर वो Crassa होगा ना.
पढ़ने में चतुर, लिखने को आतुर,
प्रेम में व्याकुल हर क्षण
वो निरंतर होगा ना.

शिव जी का उपासक,
गणेश जी का भक्त,
माँ सरस्वती के चरणों में रोज
माथा नवाता होगा ना.
हारवर्ड के पछुआ में
पुरबा गाता होगा ना.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सुशीला के इह बेटा


सुशीला के इह बेटा
ह बड़का बिगड़ैल।
फांसले बानी
छपरा के इ धुरंधर के
अपना नथुनी पे.
आवतारन प्यासल – भूखाइल सैयां
सखी आज टेम्पू से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आवतारन सैयां सखी आज टेम्पू से


कटले बानी आज छाली
सजाव दही के.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

खिलायेम आज भरपेट
दाल में घी दाल के.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

बानी आज नहईले
आज सेम्पु से.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

अंग – अंग कसके बानी तैयारी
नया चोली में.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

बात भइल रहल
कंजूस Crassa से.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

These lines were inspired by the Bhojpuri song  https://www.youtube.com/watch?v=dMoEE-Ln4dk

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा खुदा है इन निगाहों में


कभी मिलावो नजर भी
मेरा खुदा है इन निगाहों में.
खुद ही समझ जाओगी तुम
क्यों चर्चा है मेरा इस जमाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खोलीं किवाड़ के


तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
जागल होईअन सास अभी
दे वे लागियन आवाज रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

सगरो से दुखाता
सारा ई देहिया।
अब जे उठेंम
त चढ़ जाई बुखार रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

बाटे रउरा से प्यार बहुत
ना त टिकती ना इ सुखल – ससुरा में.
मुँह बंद करके धीरे – धीरे सैया
चढ़ी खटिया पे.
बाबू जी ढूढ़तारन सुबहे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

377 से 370


आज जब राहों से
गुजर रहा था
तो फूलों की पंखुड़ियों ने पूछा
इस शहर में अब भौरें नहीं है क्या?
मैंने कहा
भौरें तो हैं, मगर अब 377 नहीं हैं यहाँ।

इतने में कौवों का एक समूह
उड़ता हुआ आया और बोला
तो कश्मीर से दाना हम भी चुग आये क्या?
मैंने कहा, ” काश्मीर से दाना, क्यों?”
यहाँ दाना नहीं मिलता क्या?
कौवें बोले वो 370 के कारण
काश्मीरी कौवें तो चुगते है दाना
घूम – घूम कर, उड़ – उड़ कर
पर हम पे प्रतिबंध है वहाँ।

मैंने कहा की हजूर
377 हटी है 370 नहीं।
कौवें बोले की ये क्या माजरा है?
इंसान चाँद पे पहुँच गया
और गिनती भूल गया.
दुनिया को जीरो देने वाला
आज खुद
377 हटाने से पहले 370 भूल गया.

इंसान भी गजब है
कौवों को धोकेबाज पक्षी कहते हैं.
और खुद मैनिफेस्टो में कुछ लिखकर
सरकार ने कुछ कहा
और कानून कुछ और ला दिया।
सदियों से चली आ रही कहावत
“कौवा चला हंस की चाल ……”
अब कोई इसे इंसानों पे आजमाए।
भाजपा चली कांग्रेस की चाल
70 – 70 बोल के 77 का
लगा गयी भाव.

 

परमीत सिंह धुरंधर