कबी अपन नाटन का भी जिकार कर डिजिये। जिंदगी का कुच यस भी लूफ़्ट लिजिये। कब तक गुजरोग जिंदगी भटकक कर। कबी मात्र कामरे को हाय अपना घर मान लिजिये.माणा की पारिओन सी नाही हुन हसीन। 
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गुजरी हुई राटो का साहर नही कर्ना। बकरर राहती हुन मुख्य मुजे बदनाम नही कर्ना.लग जाति हू सेने से बीना कुच सोच संजे, एंज एंग तुम्हेसएम्प के .जाणे खान खान जी रहे मात्र विशाल, खंडन का व्यापर नाहिबर्णा में

मैं हो गयी विशाल


तेरे अंग – अंग से लग के,
मैं हो गयी विशाल।
थोड़ा काटों धीरे – धीरे राजा,
अभी हूँ मैं नै एक कचनार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की नियत


तेरी – मेरी चाहत जरुरी है,
कुछ साँसों की गर्मी है,
और कुछ मज़बूरी है.

जब भी मिलती है तू,
सरक जाता है तेरा आँचल।
कुछ हवाओं का जोर है,
और कुछ तेरी जवानी है.

तेरी हर निगाह, एक क़यामत है,
कोई माने या ना माने, मैं मानता हूँ.
पर तू बनेगी किसी और की ही,
कुछ हुस्न की नियत,
और कुछ मेरी बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

उम्र भर का है दुश्मन


मेरे दिल की दुनिया में एक सूना सा आँगन है,
जिसकी दीवारों पे कुछ भी नहीं है अपना।

ख़्वाबों को क्या देखें? जिसे दोस्त समझा,
वो ही उम्र भर का है दुश्मन अपना।

उमरते हैं बादल, घने – काले बरसने को,
पर उसके छत्ते पे आके रंग बदल लेते हैं अपना।

 

परमीत सिंह धुरंधर