ताजमहल


गुलिस्तां में हो-हल्ला बहुत है
की वो मौन हो जाती हैं
एक पत्थर फेंक के.

अंदाजे – हुस्न का शिकवा मत करों
शौहर चुनेगीं वो किसी एक को
शहर के हर चूल्हे पे अपनी रोटी सेंक के.

राजनीति और मोहब्बत के चाल – ढाल एक से
वादे और नजर बदल जाती है
एक रात की भेंट से.

हुस्न के इरादों का अगर पता होता
ताजमहल नहीं बनाते मुमताज के
कब्र की रेत पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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फिराक हम हो गए


जवानी के दिन थे और कुर्बान हम हो गए
उसकी एक नजर के आगे फिराक हम हो गए.
वो खिलने लगी हर दिन दोपहर सा
और रातों को ना बुझने वाला चिराग हम हो गए.

कसने लगा था अंगों पे उसके वस्त्र
ठहरने लगा था पाने – जाने वालो का उसपे नजर.
किस्मत में जाने वो किसके थी
मगर कुछ दिनों के बादशाह हम हो गए.

Dedicated to Firaq Gorakhpuri……

परमीत सिंह धुरंधर

प्रमाण क्या


समाहित कर हर एक धारा को
जो अब भी खरा हो
उसकी विशालता का फिर प्रमाण क्या?
और जो उस विशाल ह्रदय को
कम्पित कर दे क्षण भर में
उस धनुषधारी की समूर्णता का फिर प्रमाण क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेवा दोनों की निःस्वार्थ कीजिये


दर्द में हर दिल का पैगाम लीजिये
तन्हाई में बस प्रभु का नाम लीजिये।

असंभव क्या, और संभव क्या है?
बिना परवाह के परमार्थ कीजिये।

बूढी माँ हो या बूढी गाय हो
सेवा दोनों की निःस्वार्थ कीजिये।

वीरों की परिभाषा बस एक ये ही
राम सा धीर और धनुष दोनों धारण कीजिये।

योगी कोई नहीं मेरे शिव सा
अमृत छोड़ कर विष का पान कीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आँखों से सलाम लीजिये


दर्द में हर दिल का पैगाम लीजिये
मुस्करा कर ना सही
फिर भी आँखों से सलाम लीजिये।

मिल गए है कई साथी नए राहों में
पर पुराने खिदमतगारों का अपने
नजरें – करम लीजिये।

माना की पर्दा जरुरी है
पुराने दरकते दीवारों पे
मगर कभी तो
इन चारदीवारों में भी बैठ लीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जाने कैसे?


मुझे तो मेरी यादे जीने ही नहीं देती
जाने कैसे?
लोग इश्क़ को आग का दरिया कहते हैं.
कब का छूट गए वो दोस्त
कब का भूल चुके मुझे वो लोग
कब का दुनिया की उलझनों में
सभी परिपक्व हो गए.
और मैं वहीं का वहीं
कितना भी आगे जा रहा हूँ,
दिल – दिमाग वहीं लगा रहता है
हर नए महफ़िल में
वो ही पुराने चिरागों को ढूंढता है.
मुझ से तो बिना इश्क़ के भी जिया नहीं जा रहा
और जाने कैसे?
लोगो को इश्क़ में जीना मुश्किल हो जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार में लूट कर प्रेम में


इश्क़ अगर जामने में किसी ने किया है
तो सिर्फ बाबूसाहेब लोगों ने
आज का इश्क़ तो एक समझौता है.

एक वक्त था जब कहते थे
इश्क़ में बर्बाद हो जाओगे
आज तो बस इश्क़ में व्यापार होता है.
और ये व्यापार ही है
जिसके अंत में घाटे – फायदे का हिसाब होता है.

एक वक्त था
हम बिहार में लूट कर प्रेम में
कलकत्ता में जी लेते थे
किसी का नौकर बनकर
तो किसी के हाथगाड़ी में बंधकर।
आज तो घाटा ज्यादा हो प्रेम में तो
हत्या या आत्महत्या, इसका अंजाम होता है.

इश्क़ अगर जामने में किसी ने किया है
तो सिर्फ बाबूसाहेब लोगों ने
आज का इश्क़ तो एक समझौता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर